हाल में रीलिज हुई कुछ छत्तीसगढ़ी फिल्मों ने छत्तीसगढ़ के टाकीज संचालकों को उनके उम्मीद के विपरीत ऐसा नतीजा दिया है कि आने वाली फिल्मों के साथ सौदा करने से पहले एक्जीबिटर कई बार सोच रहे हैं। चल पाने की कितनी गुंजाइशें हैं, इस पर बड़ी गंभीरता से सोच-विचार चल रहा है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों के मार्केट की इस दयनीय दशा में ‘मया के डोरी’ को अमरदीप टाकीज मिल जाना बड़ी बात है। जहां तक 'मया की डोरी' की मेकिंग का सवाल है, तो छॉलीवुड के निर्देशकों में सिनेमाई लैंग्वेज और ग्रामर की समझ पहले की बनिस्पत बढ़ी है, उस लिहाज से ‘मया के डोरी’ में तमाम चीजें रह गई हैं। तकनीक में कुछ कमजोरियां तो हैं ही, कुछ जगहों पर कामेडी दिखाने के चक्कर में ‘बोरिंग पीरियड’ भी परोस दिया गया है। हां, स्टोरी एक लाईन की है, जिसमें किसी तरह का कन्फ्यूजन नहीं है। हीरो और हीरोइन के संबंधों को लेकर हीरोइन के पिता को ऐतराज होना, फिल्मी कहानी में नई बात नहीं रह गई। आखरी में हीरो कमाल करेगा, और अपनी प्रेमिका के पिता को प्रभावित कर लेगा, यह भी दर्शकों को क्लाइमेक्स के पहले ही समझ में आ जाता है। कहानी में नयापन नहीं है, लेकिन यह बात जरूर है कि बगैर लाग-लपेट के एक्शन, ड्रामा और लवस्टोरी पेश की गई है, जो कि दर्शकों को बिना उलझाए मनोरंजन प्रदान करती है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों को इन दिनों दर्शकों के जोरदार अकाल की जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, उसे देखकर ‘मया की डोरी’ के भविष्य का आकलन करना मुश्किल नहीं है, लेकिन ये भी सच है कि कुछ कलाकारों ने इस फिल्म में बेहतर काम किया है। मसलन, हीरो मनोज जोशी। मनोज ने इससे पहले ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’ में एक छोटी भूमिका की थी। ‘मया के डोरी’ में मनोज ने एक बड़ा प्लेटफार्म पाकर अपनी अभिनय प्रतिभा को साबित किया है। हीरोइन संजू साहू काफी अनुभवी मानी जाती हैं, लेकिन इस फिल्म में लंबा किरदार मिलने के बावजूद वे ‘किसमत के खेल’ वाला प्रभाव नहीं छोड़ पाई। विलास राउत मूलत: अभिनय क्षेत्र से वास्ता नहीं रखते, इसके बावजूद विलेन की भूमिका में वे नए नहीं लग रहे हैं। सीमा पाटले और नरेंद्र काबरा का अभिनय भी अच्छा है। हाय रे टनाटन टूरी...बोल का गाना सुनील सोनी की आवाज में हीरो की पर्सनैलिटी के साथ बेहतर मैच कर रहा है। यह जुबान पर चढ़ने लायक गाना है। निर्देशक क्रांति शर्मा की यह तीसरी फिल्म है। क्रांति शर्मा यदि ‘मया की डोरी’ को थोड़ी और मजबूती से बांधते तो वह दर्शकों को बांधकर छॉलीवुड में थोड़ी-बहुत ‘क्रांति’ ला सकती थी। फिर भी, ‘मया की डोरी’ को मजबूत न सही, कमजोर भी नहीं कहा जा सकता। बुधवार, 8 जून 2011
कमजोर नहीं है ‘मया के डोरी’
हाल में रीलिज हुई कुछ छत्तीसगढ़ी फिल्मों ने छत्तीसगढ़ के टाकीज संचालकों को उनके उम्मीद के विपरीत ऐसा नतीजा दिया है कि आने वाली फिल्मों के साथ सौदा करने से पहले एक्जीबिटर कई बार सोच रहे हैं। चल पाने की कितनी गुंजाइशें हैं, इस पर बड़ी गंभीरता से सोच-विचार चल रहा है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों के मार्केट की इस दयनीय दशा में ‘मया के डोरी’ को अमरदीप टाकीज मिल जाना बड़ी बात है। जहां तक 'मया की डोरी' की मेकिंग का सवाल है, तो छॉलीवुड के निर्देशकों में सिनेमाई लैंग्वेज और ग्रामर की समझ पहले की बनिस्पत बढ़ी है, उस लिहाज से ‘मया के डोरी’ में तमाम चीजें रह गई हैं। तकनीक में कुछ कमजोरियां तो हैं ही, कुछ जगहों पर कामेडी दिखाने के चक्कर में ‘बोरिंग पीरियड’ भी परोस दिया गया है। हां, स्टोरी एक लाईन की है, जिसमें किसी तरह का कन्फ्यूजन नहीं है। हीरो और हीरोइन के संबंधों को लेकर हीरोइन के पिता को ऐतराज होना, फिल्मी कहानी में नई बात नहीं रह गई। आखरी में हीरो कमाल करेगा, और अपनी प्रेमिका के पिता को प्रभावित कर लेगा, यह भी दर्शकों को क्लाइमेक्स के पहले ही समझ में आ जाता है। कहानी में नयापन नहीं है, लेकिन यह बात जरूर है कि बगैर लाग-लपेट के एक्शन, ड्रामा और लवस्टोरी पेश की गई है, जो कि दर्शकों को बिना उलझाए मनोरंजन प्रदान करती है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों को इन दिनों दर्शकों के जोरदार अकाल की जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, उसे देखकर ‘मया की डोरी’ के भविष्य का आकलन करना मुश्किल नहीं है, लेकिन ये भी सच है कि कुछ कलाकारों ने इस फिल्म में बेहतर काम किया है। मसलन, हीरो मनोज जोशी। मनोज ने इससे पहले ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’ में एक छोटी भूमिका की थी। ‘मया के डोरी’ में मनोज ने एक बड़ा प्लेटफार्म पाकर अपनी अभिनय प्रतिभा को साबित किया है। हीरोइन संजू साहू काफी अनुभवी मानी जाती हैं, लेकिन इस फिल्म में लंबा किरदार मिलने के बावजूद वे ‘किसमत के खेल’ वाला प्रभाव नहीं छोड़ पाई। विलास राउत मूलत: अभिनय क्षेत्र से वास्ता नहीं रखते, इसके बावजूद विलेन की भूमिका में वे नए नहीं लग रहे हैं। सीमा पाटले और नरेंद्र काबरा का अभिनय भी अच्छा है। हाय रे टनाटन टूरी...बोल का गाना सुनील सोनी की आवाज में हीरो की पर्सनैलिटी के साथ बेहतर मैच कर रहा है। यह जुबान पर चढ़ने लायक गाना है। निर्देशक क्रांति शर्मा की यह तीसरी फिल्म है। क्रांति शर्मा यदि ‘मया की डोरी’ को थोड़ी और मजबूती से बांधते तो वह दर्शकों को बांधकर छॉलीवुड में थोड़ी-बहुत ‘क्रांति’ ला सकती थी। फिर भी, ‘मया की डोरी’ को मजबूत न सही, कमजोर भी नहीं कहा जा सकता।
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