बुधवार, 16 जून 2010

यहाँ ऐसी ही फिल्म चलेगी..

फिल्म कलाकार भइया लाल हेड़ाऊ से बातचीत
‘‘त्तीसगढ़ी फिल्में बननी चाहिए। इससे प्रदेश की भाषा समृद्ध होगी, वहीं संस्कृति को पर्दे पर जगह मिलेगी, लेकिन फिल्म बनाने का मतलब यह नहीं कि छत्तीसगढ़िया दर्शकों को कुछ भी परोस दो और वे उसे स्वीकार कर लेंगे। कम से कम मुंबइया स्टाइल तो यहां नहीं चलने वाली है। दर्शक उन्हीं फिल्मों को पसंद करते हैं, जिनमें वे अपनी संस्कृति का जुड़ाव महसूस करते हैं।’’ ये विचार हैं सुविख्यात फिल्म अभिनेता भइया लाल हेड़ाऊ के, जिन्होंने 1980 में आस्कर हासिल करने वाली फिल्म ‘सदगति’ से फिल्मी कैरियर की शुरुआत की थी। छत्तीसगढ़ी सिनेमा की मौजूदा स्थिति को लेकर उनसे बातचीत हुई. पेश हैं उनके विचार-
मैं मौलिक रूप से नाटक कलाकार हूं। काम करते-करते सीरियल और टेलीफिल्मों में भी काम करने का मौका मिला। सबसे पहले फिल्म में काम करने का मौका 1980 में मिला। मुंबई की फिल्म थी-‘सदगति’। भूमिका सीमित थी, लेकिन पहली बार पड़े पर्दे के लिए कैमरे का सामना करना वाकई चैलेंजिंग रहा। जैसा भी बना, कर दिया। बाद में पता चला कि जिस ‘सदगति’ की शूटिंग रायपुर और महासमुंद के आसपास हुई है, उसे आस्कर अवार्ड मिला है। मैं सचमुच बहुत खुश था, लेकिन तभी से मुझे चस्का भी लग गया, पर्दे पर अभिनय का। इसी बीच मुझे सुंदरानी प्रोडक्शन कंपनी ने ‘पर्रा भांवर’ और ‘जय मां बम्लेश्वरी’ में काम करने का मौका दिया। इसके बाद संतोष जैन और क्षमानिधि मिश्र ने मुझे लगातार अवसर दिए। काफी अनुभव उनके साथ मिला। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद सतीश जैन ने जब ‘मोर छइंहा भुइंया’ बनाई तो उसे देखकर लगा कि यहां भी फिल्में बनाई जा सकती हैं। एक बात कहना चाहता हूँ कि ‘मोर छइंहा-भुइंया’ के बाद आई स्थिति के कारण छत्तीसगढ़ी फिल्मों का ह्यास हुआ। लोगों को लगा कि कुछ भी परोस दो, लोग देख लेंगे, लेकिन यह सोच गलत साबित हुई। वही फिल्में चलीं, जिनमें दर्शकों ने अपनापन पाया, यहां की परंपरा और संस्कृति की झलक पाई। ‘झन भूलौ मां-बाप ला’, ‘मयारू भौजी’, ‘मया दे दे मया ले ले’ आदि। हाल की फिल्मों जैसे ‘मया’, ‘भांवर’, ‘बंधना’ आदि ने संस्कृति और परंपरा के कारण अपनी अच्छी जगह बनाई। इन तमाम फिल्मों को देखने के बाद मेरी इच्छा हुई कि एक बार सतीश जैन के साथ काम किया जाए। संयोग था कि ‘टूरा रिक्शा वाला’ में मुझे अवसर मिला। मैंने इसमें काम करते हुए जाना कि सतीश जी तो काफी अनुभवी हैं ही.. लेकिन निर्माता राकी दासवानी भी अच्छे कलाकारों कि नब्ज पहचानते हैं और उन्हें को- ऑपरेट करते हैं..खैर.., मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि यहां की परंपरा और संस्कृति ही यहां के फिल्मों की जान होनी चाहिए। इस बात को ध्यान में रखकर फिल्मों का निर्माण हो। वरन, बेवकूफ सा दिखने वाला छत्तीसगढ़िहा दर्शक बीस रुपए किसी भिखारी को दे देगा, लेकिन टाकीज में घुसकर अपने बेशकीमती तीन घंटे बरबाद करना पसंद नहीं करेगा।
- विनोद डोंगरे

10 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

भईयालाल हेड़ाउ जी के विचारों से अवगत कराने के लिए धन्‍यवाद विनोद भाई.

pankaj mishra ने कहा…

shaandaar post, meri badhai.
http://udbhavna.blogspot.com/

Sanjeet Tripathi ने कहा…

shukriya bandhu ise padhwane ke liye..

आचार्य जी ने कहा…

बहुत बढिया।

Rahul Singh ने कहा…

Bhaiyalal ji ke sath to chhattisgarh aur chattisgarhi filmo ka itihas juda hi hai. lok manch bhi unse anupranit hote rahe hai. saas gari ek udahran hai, aisi lok parmparik dhuno ke liye chhattisgarhi filmo me jagah ab tak nahi bani hai. nacha gammat aur anya lok prastutiyo me raat raat bhar baithane wala darshak kya chahta hai, bhaiyalal ji ki baato se bhi spasht hai.

Rakhshanda ने कहा…

waah, bilkul theek kaha aapne...bhikari ko de dena sahi, time waste karne ke bajaay...

kuchh aor kahna hai..
aap mujhe padhte hain...kitna pyar karte hian..ye main janti hun...kuchh majbooriyan thin, jinhone door kar diya, lekin jaisa ki Amar ji ne kaha, ab vaisa hi karungi....thank you.

निर्मला कपिला ने कहा…

cछतीसगढी फिल्मो का इतिहास भाईया लाल जी की कलम से जान कर बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद इसे पढवाने के लिये।

निर्मला कपिला ने कहा…

cछतीसगढी फिल्मो का इतिहास भाईया लाल जी की कलम से जान कर बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद इसे पढवाने के लिये।

Divya ने कहा…

sehmat hun, aapki baat se

Divya ने कहा…

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