बुधवार, 2 जून 2010

आइये सब लोग पेड़ लगायें, प्लीज़..

यह सच है कि विकास के लिए पेड़ काटने पड़ते हैं, लेकिन पेड़ लगाने भी तो चाहिए। पेड़ बड़े पैमाने पर लगाए जाएं, यही आज की जरूरत है। शहर से लेकर गांव तक हर व्यक्ति को पेड़ लगाना अपना धर्म समझना होगा।
‘‘सर्वांगीण विकास के लिए सड़क, बिजली, बांध, उद्योग जैसी तमाम चीजों की जरूरत है, लेकिन जीवन की रक्षा के लिए बेहद जरूरी वृक्ष का कोई विकल्प नहीं है। पेड़ों की कटाई और वृक्षारोपण का अनुपात ऐसा हो कि यदि अति आवश्यक परिस्थिति में पेड़ काटना भी पड़े, तो उसका नुकसान पर्यावरण को न हो। ऐसा तभी संभव है, जब आम लोगों में पर्यावरण के संरक्षण और वृक्षारोपण के प्रति जागरूकता हो।’’ यह कहना है शहर के डिप्टी कलेक्टर पद से सेवानिवृत्त टीआर पठारे का, जिन्होंने अपनी सेवा अवधि में पर्यावरण संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किया। पेश हैं पर्यावरण और वृक्षारोपण को लेकर श्री पठारे के विचार-
समाजसेवा के लिहाज से पेड़ लगाना महत्वपूर्ण काम है। पेड़ लगाने की परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। पेड़ के बिना जीवन संभव नहीं है, यह साश्वत सत्य है। पहले पेड़ ज्यादा थे, तो बारिश ज्यादा होती थी। पर्यावरण संतुलित था। मानसून समय पर आता था और समय के साथ ही ऋतु परिवर्तन होता था। बदलते वक्त के साथ पर्यावरण का असंतुलन अप्रत्याशित ढंग से बढ़ गया है। वर्तमान स्थिति यह कि अब न तो बारिश होने का समय है, न ही बारिश बंद होने का। हाल के कुछ सालों में देखा गया है कि भीषण गर्मी में जब बारिश की दूर-दूर संभावना नहीं होती, तब जोरदार बारिश हो जाती है। इतनी बारिश कि लोग हैरान रह जाते हैं। इसी तरह, भरी बरसात में जब पानी की जरूरत खेतों, जलाशयों और छोटी-बड़ी सभी सरंचनाओं को होती है, तब पानी नहीं गिरता, बल्कि इतनी गर्मी पड़ती है कि लोगों को मौसम और ऋतु पर ही संदेह होने लगता है। ठंड के दिनों में भी बेमौसम बारिश अक्सर लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाती है। दरअसल, मौसम के इस असंतुलन का कारण है-पर्यावरण का असंतुलन। और पर्यावरण के असंतुलन का कारण है-पेड़ों की बेहिसाब कटाई। पेड़ों की कटाई कभी जगह के लिए हुई, तो कभी पेड़ों से बनने वाले उत्पाद के लिए। पेड़ों की कटाई करते हुउ हमने यह ध्यान नहीं दिया कि जिस अनुपात में कटाई हो रही है, उस अनुपात में वृक्षारोपण हो रहे हैं या नहीं। वृक्षारोपण हो भी रहे हैं, तो उनकी देख-रेख हो रही है या नहीं। हुआ यह कि पेड़ कट गए, पेड़ लगे नहीं। इसीलिए मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा। हां, यह सच है कि विकास के लिए पेड़ काटने पड़ते हैं, लेकिन पेड़ लगाने भी तो चाहिए। पेड़ बड़े पैमाने पर लगाए जाएं, यही आज की जरूरत है। शहर से लेकर गांव तक हर व्यक्ति को पेड़ लगाना अपना धर्म समझना होगा। शहर में इन दिनों पहले की अपेक्षा जागरूकता देखी जा रही है। इसे और बढ़ाने की आवश्यकता है। गांवों में सरकार की सबसे निचली ईकाई यानी पंच के स्तर पर भी पेड़ लगाने के लिए प्रयास करना होगा। उदाहरण के तौर पर हर पंच अपने वार्ड में दस या बीस पेड़ लगाने के लिए स्थान तय कर ले और लोगों को इसके प्रति प्रेरित करते हुए उस पर अमल करे। इसी तरह सरपंच को पंचायत स्तर पर ऐसे प्रयास करने चाहिए। सभी स्तर पर ऐसे प्रयास हों, तो पेड़ों की कमी पूरी की जा सकती है। दूसरी बात यह भी कि पेड़ तभी काटें, जब उसका कोई भी दूसरा विकल्प न हो। यानी पेड़ काटना जब बहुत जरूरी हो और उसका लाभ एक जनसमुदाय को मिलना सुनिश्चित हो, तभी पेड़ों की कटाई हो, लेकिन उसकी जगह उससे अधिक पेड़ लगाने का कार्य भी होना चाहिए। मेरा तो व्यक्तिगत मानना है कि कुछ पेड़ ऐसे होते हैं जिनके लिए विशेष वातावरण की जरूरत नहीं होती। वे कहीं भी और कभी भी उग जाते हैं। जैसे-नीम, कहुवा, पीपल और बरगद इत्यादि। ऐसे पेड़ों को बड़े पैमाने पर लगाना चाहिए। पेड़ों की जरूरत हर घर को ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को है। इसीलिए हर व्यक्ति को इस दिशा में कृत संकल्पित होना चाहिए। वरन, पेड़ तो खत्म हो ही रहे हैं, हम-आप भी कब खत्म हो जाएंगे, पता नहीं चलेगा...।
विनोद डोंगरे

3 comments:

आचार्य जी ने कहा…

क्रोध पर नियंत्रण स्वभाविक व्यवहार से ही संभव है जो साधना से कम नहीं है।

आइये क्रोध को शांत करने का उपाय अपनायें !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

वृक्षारोपण आज की ज़रुरत है - उपयोगी आलेख!

Rahul Singh ने कहा…

pathare ji la bahut din ma bhete hau. swagat, adhivadan au badhai.