रविवार, 23 मई 2010

पंचायत या पीड़ादायक...?

पंचायती राज की परिकल्पना की गयी थी, तो उसमें पंचों को इतना सुदृढ़ बना देने का भाव था की वे पंचायत पर आस्था रखने वाली आम जनता की भावनाओं की रक्षा के लिए हर कदम दमदारी से उठा सकें....खाप पंचायत जैसी पीड़ादायक परिणति की कल्पना तो उन्हें भी नही रही होगी, जिन्होंने पंचायती राज की परिकल्पना की थी...चंद्रकांत शुक्ला की समीक्षा -
खाप पंचायत के फैसले के बाद मप्र के भिण्ड जिले के निबाड़ी गांव की पारंपरिक पंचायत के फैसले ने लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहरा प्रहार किया है। इस पंचायत का फरमान जारी होने के बाद गांव के 12 साल के बच्चे को नंगे पैर जंगल में रहना पड़ रहा है। गांव से खदेड़ते हुए लोगों ने उसकी कमीज भी उतार ली। साथ ही उसके माता-पिता का भी बहिष्कार कर दिया गया। उन्हें अपने बच्चे से मिलने की भी इजाजत नहीं है। बच्चे का कसूर यह था कि उसने एक गाय पर पत्थर फेंक दिया था। छत्तीसगढ़ में पारंपरिक व जाति पंचायतों द्वारा एक साल में 70 महिलाओं को डायन घोषित कर मौत के घाट उतार दिया गया तथा कई को निर्वासित जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ा। 2008 में सरगुजा, राजनांदगांव, रायपुर और दंतेवाड़ा जिले में 22 महिलाओं पर टोनही (डायन) के संदेह में अत्याचार किए गए। इस तरह एक गौत्र या अन्तर्जातीय विवाह के चलते कई युवक-युवतियों की या तो हत्या कर दी गई या आत्महत्या के लिए विवश कर दिया गया। मध्यप्रदेश में कुछ समुदायो में जाति पंचायतों द्वारा महिलाओं के चरित्र पर शक होने पर उन्हें अंगारों पर चलने या खौलते तेल में हाथ डालने जैसे अमानवीय फरमानों का पालन करने को विवश किया जाता है। जाहिर है कि आधुनिक समाज में सदियों पुरानी अमानवीय प्रथाओं को जिन्दा रखे जाने के पीछे सामंती तत्वों का हाथ है, जो अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए पारंपरिक पंचायतों के नाम पर संवैधानिक मूल्यों का हनन करते हैं। किन्तु अपनी राजनैतिक व प्रशासनिक पहुंच तथा आर्थिक सम्पन्नता के चलते वे कानून के चंगुल से बच निकलते हैं। इस दशा में आधुनिक समाज में पुरातन मूल्यों को फलने-फूलने का अवसर मिल जाता है।पारंपरिक व्यवस्था को महिमामंडित करने वालों की भी कमी नहीं है। इससे समाज के मर्यादापूर्ण, अनुशासित तथा सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न होने के तर्क भी दिए जाते हैं। पारंपरिक न्याय व्यवस्था को कोर्ट-कचहरी के पचड़े से मुक्त करने का औजार भी माना जाता हैं। किन्तु यह भी समझना जरूरी है कि पारंपरिक व जाति पंचायतों तथा पारंपरिक न्याय व्यवस्था में महिलाओं व गांव के गरीब-वंचित लोगों की किसी भी रूप में हिस्सेदारी नहीं रही है। महिलाओं के चरित्र पर बात करने वाली पारंपरिक पंचायतों में महिलाओं को बोलने की अनुमति देना तो दूर, उन्हें वहां बैठने की भी इजाजत नहीं होती। इस प्रकार अलोकतांत्रिक और सामंती ढांचे वाली पारंपरिक व जाति पंचायतों से किसी भी रूप में न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती। भिण्ड जिले में जिस तरह एक मासूम को उसके जीवन जीने के अधिकार से वंचित कर घर से दूर जंगल में एक झोपड़े में नंगे बदन रहने के लिए मजबूर किया, उसे संविधान के प्रति गंभीर जुर्म घोषित किए जाने की जरूरत है। साथ ही सरकारी तंत्र की जबावदेही भी सुनिश्चित की जाना चाहिए। पारंपरिक पंचायत के इस फैसले ने मानवाधिकार हनन की पराकाष्ठा को छू लिया है। इससे संवैधानिक और मानवीय मूल्यों का हनन करने वाली पारंपरिक न्याय व्यवस्था पर सवाल खडे होते हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि संविधान को लागू हुए छह दशक बीत जाने के बाद भी पारंपरिक और सामंती समाज की जड़े कमजोर नहीं हो पाई हैं।
(लेखक वर्तमान में दैनिक हरिभूमि के रायपुर संस्करण में बतौर एडिटोरिअल हेड कार्यरत हैं)

2 comments:

girish pankaj ने कहा…

sundar blog ..uttam prayaas. isi tarah srijan path par barhate rahe, yahi hai is agraj ki shubhkamana.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

अपराधियों के गिरोह जैसा बर्ताव करने वाली ऐसी पंचायतें तो इंसानियत के नाम पर कलंक हैं.