शेफाली बर्मन वह नाम है, जिसकी आवाज सुनकर शायद ही कोई अंदाजा लगा सकेगा कि उन्होंने उम्र का चौथा पड़ाव पार कर लिया है। आयु की इस अवस्था में भी मधुर आवाज की मल्लिका, सुप्रसिद्ध गजल गायिका शेफाली वह शख्सियत हैं, जिनकी संबद्धता देश के नामी-गिरामी संगीत संस्थानों से है। देश के साथ विदेशों में भी गजल की तान छेड़कर तालियों की गड़गड़ाहट बटोर चुकी शेफाली कहती हैं कि जब तमाम भाषाओं में गजलें बनाई और गायी जा सकती हैं, तो फिर छत्तीसगढ़ी भाषा में भी क्यों नहीं...? पेश है उनसे बातचीत के अंश-
संगीत (गजल गायकी) के क्षेत्र में आपका रुझान कब और कैसे उत्पन्न हुआ..?
मैं जिस परिवार से ताल्लुकात रखती हूं, वहां माहौल ही संगीत का रहा है। मैं बचपन से गायन में शौक रखती थी। शौक के कारण मुझे मेरे परिवार ने मदद की और मैं धीरे-धीरे रियाज करने लगी। बाद में पता नहीं चला कि कब मैं इसमें माहिर हो गई।
विवाह के बाद भी आप लगातार गजल गायकी करती रहीं। परिवार अथवा पति के विरोध का सामना तो नहीं करना पड़ा..?
बिल्कुल नहीं, मेरे पति दिनेश बर्मन भी संगीत से जुड़े हुए हैं। वे तबलावादक हैं। पति का भी कला से जुड़ा होना मेरे लिए फायदेमंद रहा। एक कलाकार दूसरे कलाकार की भावनाओं को बेहतर समझ सकता है। मेरे पति मेरी काफी मदद करते हैं। आज भी वे हर जगह मुझे हौसला ही देते हैं। हर कदम पर उनका मुझे जोरदार साथ मिला।
परिवार में और किसी का रुझान संगीत के प्रति..?
जी हां, मेरी दोनों बेटियों का संगीत में काफी रुझान है। एक बेटी कोलकाता में रहती है, दूसरी बेटी शिल्पी रायपुर में ही इंटीरियर डिजाइनर है। दोनों की गायन में रुचि है। वे दोनों मेरा साथ भी देती हैं।
अब तक कहां-कहां कार्यक्रम दे चुकी हैं आप..?
मैं अब तक देश के लगभग हर बड़े शहर में कार्यक्रम दे चुकी हूं। हाल ही में मैंने सउदी अरब में भी एक कार्यक्रम पेश किया। बंगाली कम्युनिटी द्वारा आयोजित उस कार्यक्रम में मेरी गजलों को काफी अच्छा रिस्पांस मिला। इसके अलावा आकाशवाणी और दूरदर्शन में मेरी गजलों की प्रस्तुति नियमित रूप से होती ही है।
किसी संस्थान विशेष से आपकी संबद्धता..?
हां, मैं अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय से जुड़ी हुई हूं। मैं वहां की स्थायी सदस्य हूं। इसके अलावा छोटे-मोटे संगठन और सांस्कृतिक संस्थाएं तो दर्जनों हैं, जिनकी मैं मेंबर हूं।
आपने अपनी खुद की कोई संस्था नहीं बनाई..?
संस्था तो नहीं बनाई, लेकिन सरस्वती संगीत विद्यालय नाम से एक कक्षा जरूर शुरू की। इस समय मैं दस नए गायकों को गजल सिखा रहीं हूं।
नए गायकों से कुछ कहना चाहेंगी..?
बस इतना ही कि गायन में उच्चारण का बड़ा महत्व है। इसके लिए बार-बार अभ्यास किया जाना चाहिए। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि शुद्ध उच्चारण के बिना गायन में पूर्णता नहीं आती।
गजल में कुछ नए प्रयोग के बारे में सोचती हैं..?
मैं एक बात सोचती हूं कि मराठी, उर्दू, हिंदी और तमाम भाषाओं में गजल गाई जा रही हैं, तो क्यों न छत्तीसगढ़ी में भी गजल लिखी जाएं। अगर कोई ढंग का राइटर मुझे साथ दे, तो मैं शानदार धुन तैयार करूंगी। मैं सोचती हूं कि छत्तीसगढ़ी में भी गजल की जबर्दस्त गुंजाइश है, बस उस दर्जे की मेहनत करनी पड़ेगी। विनोद डोंगरे


4 comments:
nice
अच्छी और विचारणीय प्रस्तुती / शेफाली जी के विचार अच्छे हैं /
धन्यवाद विनोद भाई.
bahoot achha mere blog par aane thatha tipani dene ke liye danyvaad
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