नक्सली वारदातों पर अनुराग शुक्ला का विश्लेषण नक्सलियों ने जिस तरह छत्तीसगढ़ में घटना को अंजाम दिया है इससे सरकार काफी चिन्तित है। यही नहीं, इससे पहले भी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर क्षेत्र में भी दिन दहाड़े पुलिस कैम्प पर हमलाकर नक्सलियों ने 24 जवानों की हत्या कर दी थी और उनके हथियारों को लूट लिया था। फिर भी क्रेन्द व राज्य सरकार इनसे निपटने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठा रही है यदि ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश की एकता व अखंण्डता भी खतरे में पड़ सकती है। आज देश में पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक हर आदमी अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित नजर आ रहा है चाहे वह घर पर ही हो या सफर क्यों न कर रहा हो... सभी जगह खतरा बरकरार है। नक्सलियों की पीपुल्स गोरिल्ला लिबरेशन आर्मी देश की सुरक्षा व्यवस्था पर भारी पड़ रही है। स्वयं गृहमंत्री इस बात को मान चुके हैं। गृहमंत्री पी। चिदम्बरम ने स्वयं एक बयान में स्पष्ट किया है कि इसका प्रभाव 20 प्रदेश में 223 जनपद के 400 पुलिस स्टेशन क्षेत्र पर विशेष तौर पर प्रभावित है। उन्होंने यह भी कहा कि वे इस समस्या से जल्द ही निपटेंगे जबकि उनके विरोध में नक्सली नेता कोटेश्वर राव ने गर्व से कहा कि सत्ता जनादेश से नहीं बंदूक की नली से निकलती है। इसका क्या मतलब है... कहीं ये नक्सली हमारे लोकतंत्र को चुनौती तो नहीं दे रहे हैं। इसलिए ऐसी घटनाऐं को वे बार-बार अंजाम दे रहे हैं। अगर पिछली कुछ घटनाओं पर नजर ड़ालें तो स्पष्ट है कि 2008 में नक्सल की कुल 1591 घटनाएं हुईं। 721 व्यक्ति मारे गए। हर वर्ष लगभग 1500 से ज्यादा घटनाएं घटित हो रही हैं और औसतन 700 से ज्यादा लोग मारे जा रहे हैं। फिर भी इसका हल नहीं निकल पा रहा है जबकि झारखंड में पुलिस इंस्पेक्टर फ्रांसिस इदुवार का गला काटकर हत्या कर दी गई थी। सरकार तो सक्रिय है लेकिन राज्य सरकार के नतमस्तक सी हो जाती है। आज पूरे देश में नक्सलियों की घटनाएं चरम पर हैं। जब सरकार आपरेशन ग्रीन हंट चला रही है तो नक्सली भी ऐसी क्रूर घटनाओं को अंजाम देकर उन्हें सीधे चुनौती दे रहे हैं। अगर इनकी चुनौती को कबूल नहीं किया गया या सरकार कठोर कदम नहीं उठाती है तो अंजाम भुगतते रहना होगा। जब माओपंथी देश के 13 से ज्यादा राज्यों में युद्वरत हैं वहीं करीब 50 हजार नक्सली प्रशिक्षित हैं जो ऐसी रक्तरंजित घटनाओं को अंजाम देते हैं। यही नहीं सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ के 25 हजार गॉवों में इनकी सत्ता बरकरार है। जब हम दक्षिण की ओर देखें तो आन्ध्र प्रदेश के वारंगल, करीमनगर, नालमल्ला, पालनाडु, उत्तरी तेलंगाना में इनका राज्य है। वहीं बिहार में भी इनकी सत्ता के आगे राज्य सरकार बेबस है। लगभग 38 जिलों में से 34 जिलों में इनका दबदबा है और ये वहां पर पूरी तरह सुरक्षित है। झारखण्ड़ में तो एक तिहाई से ज्यादा क्षे़त्र नक्सलियों के कब्जे में है ऐसा ही कुछ हाल उत्तर प्रदेश का भी है। सोनभद्र, मिर्जापुर सहित लगभग 800 गॉवों में नक्सलियों का कब्जा है। वहां के आदिवासी भी सरकार से ज्यादा नक्सलियों पर भरोसा करते हैं। फिर भी सरकार इनको तलाशने में असमर्थ है। आज जब पूरे देश को पता है कि ये नक्सली नेपाल के माओवादी संगठनों से जुड़े है तो सरकार को क्यों नहीं पता है अगर संज्ञान में है तो अब तक कार्यवाही क्यों नहीं। जब बात देश और राज्य की सुरक्षा की हो तो केन्द्र सरकार और राज्य सरकार इस ओर कठोर कदम क्यों नहीं उठा पा रही हैं जबकि केन्द्र सरकार पर राष्ट्र सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी है। हमारे संविधान की 7वीं अनुसूची-संघसूची में भारत व उसके प्रत्येक भाग की सुरक्षा निहित है किन्तु नक्सलियों से सरकार अभी भी क्यों बात करना चाहती है। उन्होने तो साफ कह दिया है कि यदि ऑपरेशन ग्रीन हंट चालू रहा तो वे इसी तरह लोगों को मारते रहेंगे। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले नक्सलियों को अब बात के लिए आमंत्रित क्यों किया जाए? सवाल देश की आंतरिक सुरक्षा का है, और ऐसे समय जब पड़ोसी देशों से खतरा बरकरार है। जल्द ही केन्द्र को राज्य सरकार से मिलकर कार्यवाही करके नक्सली समस्या का समाधान निकालना होगा अन्यथा और खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। रविवार, 23 मई 2010
सरकार की स्थिरता का परिणाम है नक्सली
नक्सली वारदातों पर अनुराग शुक्ला का विश्लेषण नक्सलियों ने जिस तरह छत्तीसगढ़ में घटना को अंजाम दिया है इससे सरकार काफी चिन्तित है। यही नहीं, इससे पहले भी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर क्षेत्र में भी दिन दहाड़े पुलिस कैम्प पर हमलाकर नक्सलियों ने 24 जवानों की हत्या कर दी थी और उनके हथियारों को लूट लिया था। फिर भी क्रेन्द व राज्य सरकार इनसे निपटने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठा रही है यदि ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश की एकता व अखंण्डता भी खतरे में पड़ सकती है। आज देश में पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक हर आदमी अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित नजर आ रहा है चाहे वह घर पर ही हो या सफर क्यों न कर रहा हो... सभी जगह खतरा बरकरार है। नक्सलियों की पीपुल्स गोरिल्ला लिबरेशन आर्मी देश की सुरक्षा व्यवस्था पर भारी पड़ रही है। स्वयं गृहमंत्री इस बात को मान चुके हैं। गृहमंत्री पी। चिदम्बरम ने स्वयं एक बयान में स्पष्ट किया है कि इसका प्रभाव 20 प्रदेश में 223 जनपद के 400 पुलिस स्टेशन क्षेत्र पर विशेष तौर पर प्रभावित है। उन्होंने यह भी कहा कि वे इस समस्या से जल्द ही निपटेंगे जबकि उनके विरोध में नक्सली नेता कोटेश्वर राव ने गर्व से कहा कि सत्ता जनादेश से नहीं बंदूक की नली से निकलती है। इसका क्या मतलब है... कहीं ये नक्सली हमारे लोकतंत्र को चुनौती तो नहीं दे रहे हैं। इसलिए ऐसी घटनाऐं को वे बार-बार अंजाम दे रहे हैं। अगर पिछली कुछ घटनाओं पर नजर ड़ालें तो स्पष्ट है कि 2008 में नक्सल की कुल 1591 घटनाएं हुईं। 721 व्यक्ति मारे गए। हर वर्ष लगभग 1500 से ज्यादा घटनाएं घटित हो रही हैं और औसतन 700 से ज्यादा लोग मारे जा रहे हैं। फिर भी इसका हल नहीं निकल पा रहा है जबकि झारखंड में पुलिस इंस्पेक्टर फ्रांसिस इदुवार का गला काटकर हत्या कर दी गई थी। सरकार तो सक्रिय है लेकिन राज्य सरकार के नतमस्तक सी हो जाती है। आज पूरे देश में नक्सलियों की घटनाएं चरम पर हैं। जब सरकार आपरेशन ग्रीन हंट चला रही है तो नक्सली भी ऐसी क्रूर घटनाओं को अंजाम देकर उन्हें सीधे चुनौती दे रहे हैं। अगर इनकी चुनौती को कबूल नहीं किया गया या सरकार कठोर कदम नहीं उठाती है तो अंजाम भुगतते रहना होगा। जब माओपंथी देश के 13 से ज्यादा राज्यों में युद्वरत हैं वहीं करीब 50 हजार नक्सली प्रशिक्षित हैं जो ऐसी रक्तरंजित घटनाओं को अंजाम देते हैं। यही नहीं सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ के 25 हजार गॉवों में इनकी सत्ता बरकरार है। जब हम दक्षिण की ओर देखें तो आन्ध्र प्रदेश के वारंगल, करीमनगर, नालमल्ला, पालनाडु, उत्तरी तेलंगाना में इनका राज्य है। वहीं बिहार में भी इनकी सत्ता के आगे राज्य सरकार बेबस है। लगभग 38 जिलों में से 34 जिलों में इनका दबदबा है और ये वहां पर पूरी तरह सुरक्षित है। झारखण्ड़ में तो एक तिहाई से ज्यादा क्षे़त्र नक्सलियों के कब्जे में है ऐसा ही कुछ हाल उत्तर प्रदेश का भी है। सोनभद्र, मिर्जापुर सहित लगभग 800 गॉवों में नक्सलियों का कब्जा है। वहां के आदिवासी भी सरकार से ज्यादा नक्सलियों पर भरोसा करते हैं। फिर भी सरकार इनको तलाशने में असमर्थ है। आज जब पूरे देश को पता है कि ये नक्सली नेपाल के माओवादी संगठनों से जुड़े है तो सरकार को क्यों नहीं पता है अगर संज्ञान में है तो अब तक कार्यवाही क्यों नहीं। जब बात देश और राज्य की सुरक्षा की हो तो केन्द्र सरकार और राज्य सरकार इस ओर कठोर कदम क्यों नहीं उठा पा रही हैं जबकि केन्द्र सरकार पर राष्ट्र सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी है। हमारे संविधान की 7वीं अनुसूची-संघसूची में भारत व उसके प्रत्येक भाग की सुरक्षा निहित है किन्तु नक्सलियों से सरकार अभी भी क्यों बात करना चाहती है। उन्होने तो साफ कह दिया है कि यदि ऑपरेशन ग्रीन हंट चालू रहा तो वे इसी तरह लोगों को मारते रहेंगे। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले नक्सलियों को अब बात के लिए आमंत्रित क्यों किया जाए? सवाल देश की आंतरिक सुरक्षा का है, और ऐसे समय जब पड़ोसी देशों से खतरा बरकरार है। जल्द ही केन्द्र को राज्य सरकार से मिलकर कार्यवाही करके नक्सली समस्या का समाधान निकालना होगा अन्यथा और खतरनाक परिणाम हो सकते हैं।
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