चीला, फुगड़ी और हरेली के साथ मनोरंजनमनोरंजन के साथ छत्तीसगढ़ के जीवन और दर्शन को देखना हो तो फिल्म ‘गुरांवट’ देखी जा सकती है। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए न कोई बनावटी वेशभूषा न संवाद में लाग-लपेट। ‘चीला रोटी’ से लेकर ‘फुगड़ी’ तक और ‘हरेली’ से लेकर ‘देवऊठनी’ तक छत्तीसगढ़ी जीवन शैली का सीधा-सपाट पारिवारिक और सामाजिक कथा इस फिल्म में दिखाया गया है। ‘गुरांवट’ के निर्माता और कहानी के लेखक चन्द्रशेखर चकोर छत्तीसगढ़ी की प्रतिष्ठित पत्रिका 'बरछाबारी' के संस्थापक-संपादक भी हैं । फिल्म के गानों और दृश्यों में चकोर की सांस्कृतिक समझ और साहित्यिक पकड़ दोनों का पता चलता है। शैल किरण की आवाज में ‘अलदी-बलदी ..’ गीत के साथ ही गुरांवट को परिभाषित करती हुई फिल्म शुरू होती है और पूरे समय छत्तीसगढ़ के विभिन्न पंरपरा, संस्कृति, खान-पान और खेल-कुद से दर्शकों को परिचय कराते हुए स्वस्थ मनोरंजन कराती है। बालीवुड ट्रेक पर फिल्म बनाते हुए दर्शकों को मनोरंजन उपलध कराने की जैसी होड़ इन दिनों चल पड़ी है, वहां पूरी तरह परंपरा और संस्कृति पर आधारित फिल्म का निर्माण सचमुच साहस का काम है। इस फिल्म के माध्यम से वह साहसिक कदम उठाया गया है। फिल्म के नब्बे फीसदी शब्द ठेठ छत्तीसगढ़ी के हैं। दस फीसदी शब्द मिलावटी हैं, लेकिन प्रचलित भी। लक्ष्मण मस्तुरिहा की आवाज में ‘मोर दुनिया होगे अंधियार...’ हर उस पिता को भावुक कर जाता है, जो अपनी बिटिया का विवाह करने वाला हो। चकोर और कविता वासनिक की आवाज में ‘तंय चंदा हरस..’ गीत में मधुरता और श्रृंगार का अनोखा प्रयोग है। ‘गुरांवट’ शब्द का ठेठपन भी अनूठा है, जिसका न कोई हिन्दी शब्दार्थ है न अंग्रेजी। फिल्म के हीरो शिव चन्द्राकर और संजू साहू स्थानीय कलाकार हैं, जिन्हें परंपरा और पारंपरिक कला दोनों की समझ है। लीड रोल के हिसाब से दोनों के लिए यह पहला मौका है, लेकिन काम सराहनीय है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति, कला और सम्पूर्ण जीवनशैली की साफ-सुथरी तस्वीर ‘गुरांवट’ में प्रस्तुत की गई है।
समीक्षा- विनोद डोंगरे

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